वास्तु शास्त्र एक प्राचीन भारतीय पद्धति है जो भवन की दिशा, आकार और बनावट का प्रकृति की शक्तियों - धूप, हवा, जल, पृथ्वी और खुले स्थान - से संबंध समझाती है।
पाँच तत्व (पंचमहाभूत)
वास्तु जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश के साथ काम करता है। परंपरा के अनुसार उत्तर-पूर्व जल और खुले स्थान से, दक्षिण-पूर्व अग्नि से और दक्षिण-पश्चिम पृथ्वी तथा भारी निर्माण से जुड़ा माना जाता है।
परामर्श में किन बातों की जाँच होती है
- प्लॉट का आकार, ढलान, सड़क की दिशा और आसपास का वातावरण
- मुख्य द्वार की दिशा और डिग्री
- रसोई, पूजा कक्ष, शयनकक्ष, शौचालय और सीढ़ियों का स्थान
- पानी के स्रोत और खुले स्थान की स्थिति
क्या हर वास्तु दोष में तोड़-फोड़ ज़रूरी है?
नहीं। कई मामलों में कमरे का उपयोग बदलना, फर्नीचर की जगह बदलना, रंग, रोशनी, हवा का प्रवाह और पारंपरिक उपाय बिना तोड़-फोड़ के भी समस्या कम कर सकते हैं।
वास्तु एक पारंपरिक मार्गदर्शन पद्धति है। संरचनात्मक मामलों में योग्य इंजीनियर या आर्किटेक्ट से भी सलाह लें।